अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन हिदायतुल्लाह ख़ान की मुख्यमंत्री से अपील— शीघ्र दी जाए मंज़ूरी

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आलिम-फ़ाज़िल की डिग्रियों को रद्द किए जाने से मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय में नाराज़गी


रांची: झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन हिदायतुल्लाह ख़ान ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक पत्र लिखा है। उन्होंने पत्र के माध्यम से आलिम-फ़ाज़िल डिग्रियों की रद्दीकरण से मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय में पैदा हुई नाराज़गी की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित कराया है। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री से यह अपील की है कि आलिम-फ़ाज़िल डिग्री को मंज़ूरी देने की दिशा में सकारात्मक पहल की जाए। राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन हिदायतुल्लाह ख़ान ने यह पत्र उच्च शिक्षा मंत्री सुदीव्य कुमार सोनू और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफ़ीज़ुल हसन को भी भेजा है।
पत्र में उन्होंने लिखा है कि आलिम और फ़ाज़िल की डिग्रियों को रद्द किए जाने तथा मंज़ूरी न देने को लेकर झारखंड के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय में नाराज़गी है। झारखंड के सभी जिलों में मुस्लिम समुदाय ने आयोग के समक्ष अपनी कड़ी नाराज़गी व्यक्त की है। आयोग ने 23 सितंबर 2025 को अपनी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की थी और एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें सरकार से इस मामले पर आवश्यक कार्रवाई करने का आग्रह किया गया था। उक्त बैठक की कार्यवाही की एक प्रति (जिसमें मुख्य रूप से आलिम-फ़ाज़िल के मुद्दे पर चर्चा की गई थी) आयोग के सचिव कार्यालय से सरकार को भेज दी गई है, जिसका पत्र संख्या 150, दिनांक 29/10/2025 है।
5 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड की आलिम और फ़ाज़िल डिग्रियों पर अपना निर्णय सुनाया, जो कि UG/PG डिग्रियों के समकक्ष मानी जाती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मदरसा बोर्ड UGC के अधिकार क्षेत्र में आने वाली डिग्रियाँ नहीं दे सकता— यह असंवैधानिक है— और इस मामले में निर्णय लेना उत्तर प्रदेश सरकार की ज़िम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड अधिनियम 2004 से संबंधित है, न कि झारखंड सरकार की झारखंड एकेडमिक काउंसिल द्वारा दी जाने वाली आलिम-फ़ाज़िल डिग्रियों से।
इस निर्णय के बावजूद JAC बोर्ड के अधिकारी झारखंड में सैकड़ों युवाओं के भविष्य को ख़तरे में डाल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बावजूद बिहार सहित अन्य राज्यों में आलिम-फ़ाज़िल की डिग्रियाँ दी जा रही हैं और इन डिग्रियों के आधार पर युवाओं को नौकरी के अवसर मिल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को अन्य राज्यों में प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है, लेकिन निर्णय की तिथि से। किंतु झारखंड स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव, विधि विभाग से सलाह लिए बिना, JAC द्वारा दी गई आलिम-फ़ाज़िल डिग्रियों को असंवैधानिक बता रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूर्व प्रभाव से लागू करने पर अड़े हुए हैं — यानी पहले से दी गई डिग्रियों पर भी— जो कि पूर्णत: अनुचित है।
इस तरह के व्यवहार से झारखंड सरकार की छवि खराब हो रही है और अल्पसंख्यक समुदाय इस निर्णय से बेहद नाराज़ है। यह मनमानी कार्यवाही झारखंड के हज़ारों युवाओं को प्रभावित कर रही है, जिससे वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग आलिम-फ़ाज़िल से प्रशिक्षित उम्मीदवारों के अंतिम परिणाम जारी नहीं कर रहा है, जिन्होंने दस्तावेज़ सत्यापन के बाद 2023 में सहायक प्राध्यापक (भाषा) के पद के लिए आवेदन दिया था। इसी तरह फ़ाज़िल डिग्री धारकों को सेकेंडरी प्रोफेसर (भाषा) के पद में भी शामिल नहीं किया जा रहा है। इसके कारण अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में शिक्षा विभाग और JSSC के प्रति नाराज़गी बढ़ रही है और लोग विभिन्न जिलों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
उन्होंने आगे लिखा कि 2003 से झारखंड एकेडमिक काउंसिल मदरसा आलिम-फ़ाज़िल की परीक्षा ले रही है, जो सरकार के निर्णय के आधार पर UG/PG के समकक्ष है। JAC ने इसे बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत लिया है और पत्र संख्या JAC/3/062/062/39/062 के माध्यम से अधिसूचित किया है। इससे पहले, बिहार सरकार के कार्मिक विभाग ने आदेश संख्या 4226 दिनांक 11/03/1977 और आदेश संख्या 4236 दिनांक 11/03/1977 के माध्यम से विश्वविद्यालय-स्तरीय पाठ्यक्रम विशेषज्ञों द्वारा तैयार करवाकर लागू किया था। झारखंड में इस डिग्री के साथ सैकड़ों उम्मीदवार सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं, और 2023–2024 में झारखंड की आलिम-फ़ाज़िल डिग्री वाले कई लोग बिहार के हाई स्कूल प्लस-2 स्कूलों में शिक्षक नियुक्त हुए हैं।
उन्होंने लिखा कि आपको मुझे झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग का चेयरपर्सन नियुक्त किया है और मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा करूँ। कई जिलों में समुदाय ने सरकार के इस निर्णय पर आयोग के समक्ष असंतोष व्यक्त किया है। समुदाय के जागरूक लोगों का कहना है कि बिहार में नीतीश कुमार की NDA सरकार ने आलिम-फ़ाज़िल डिग्री को बनाए रखा है, जबकि झारखंड में हमारी अपनी सरकार ने इसे निलंबित कर दिया है, जिससे सरकार पर अल्पसंख्यक-विरोधी होने के आरोप लग रहे हैं।
झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की सिफ़ारिशें:
1. 2003 से 2023 तक JAC द्वारा दी गई आलिम-फ़ाज़िल डिग्रियों की वैधता और मान्यता को BA और MA के समकक्ष बनाए रखा जाए।

2. D.V पूरा कर चुके आलिम उम्मीदवारों के सहायक प्राध्यापक (भाषा) पद के परिणाम जारी किए जाएँ।

3. फ़ाज़िल डिग्री धारकों को सेकेंडरी प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में मान्यता दी जाए।

4. विश्वविद्यालय वर्तमान सत्र में ही आलिम और फ़ाज़िल डिग्री परीक्षाओं का आयोजन करे।

5. बिहार सरकार की तरह आलिम-फ़ाज़िल की परीक्षाओं के लिए एक अलग विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, या वैकल्पिक रूप से झारखंड में किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय के माध्यम से ये परीक्षाएँ आयोजित कराई जाएँ।
अतः वर्तमान स्थिति पर गंभीरता से विचार करते हुए कृपया इस समस्या के समाधान के लिए उचित निर्णय लिया जाए, ताकि झारखंड के हज़ारों मुस्लिम शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।

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