जंतर-मंतर पर छात्रों को ‘लाल-हरा’ करने की बात कहने वाले कुणाल, अब झारखंड में छात्रों की आवाज़?फोटो नहीं कार्यशैली पूछ रही है सवाल ?क्या छात्रों के साथ कुणाल राजनीत कर गए है ?पुराने सोशल मीडिया पोस्ट और BJP नेताओं से करीबी के बीच JPSC-JSSC आंदोलन के चेहरे कुणाल प्रताप सिंह की भूमिका पर उठ रहे सवालरांची।
झारखंड में JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा इन दिनों कुणाल प्रताप सिंह हैं। धरना हो, प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या सरकार के खिलाफ मोर्चा—कुणाल लगातार छात्रों की आवाज बनकर सामने दिखाई दे रहे हैं। 26 दिनों तक चले आंदोलन के बाद सरकार द्वारा 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले के बाद भी उनका आंदोलन और सरकार पर सवाल जारी हैं।लेकिन अब कुणाल के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट ने उनकी राजनीतिक निष्पक्षता और मंशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
मामला 23 जुलाई 2026 के उनके उस X पोस्ट का है, जिसका स्क्रीनशॉट सामने आया है। पोस्ट में दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET को लेकर चल रहे प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए कुणाल लिखते हैं—“ये जंतर मंतर पर चल रहा NEET का प्रोटेस्ट है? क्या ये किसी भी angle से स्टूडेंट्स लगते हैं?”इसके बाद @abhinaymaths को टैग करते हुए वह प्रदर्शन के समर्थन पर सवाल उठाते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह को टैग करते हुए लिखते हैं—“ऐसे लोगों को चुन-चुन कर इनका पिछवाड़ा लाल और हरा किया जाए।”यानी उस समय सड़क पर उतरकर परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा रहे प्रदर्शनकारियों के लिए भाषा बेहद आक्रामक थी।अ
ब सवाल यही है—जो व्यक्ति दिल्ली में छात्रों के आंदोलन को इस नजरिए से देख रहा था, वही आज झारखंड में छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व कैसे कर रहा है?सवाल सिर्फ एक पोस्ट का नहींकिसी पुराने ट्वीट को लेकर सवाल उठना अलग बात है और किसी व्यक्ति को राजनीतिक दल का एजेंट घोषित कर देना अलग।कुणाल प्रताप सिंह खुद छात्र आंदोलन को राजनीतिक मंच नहीं बनने देने की बात कहते रहे हैं। उनके सार्वजनिक संदेशों में यह भी कहा गया है कि सभी राजनीतिक दल छात्रों को नैतिक समर्थन दे सकते हैं, लेकिन आंदोलन का संचालन छात्रों के हाथ में होना चाहिए।लेकिन उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड को देखने पर BJP नेताओं के साथ उनकी राजनीतिक नजदीकी पर सवाल उठाने के लिए सामग्री जरूर मिलती है।मसलन, एक पुराने पोस्ट में कुणाल ने तत्कालीन झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अमर बाउरी को सीधे धन्यवाद देते हुए लिखा था कि अगर उन्होंने मुद्दा नहीं उठाया होता तो भ्रष्टाचार का पर्दाफाश नहीं होता।
इसी पोस्ट में उन्होंने यहां तक लिखा कि अगर BJP की सरकार बनती है तो PGT और JSSC-CGL पेपर लीक मामले की CBI जांच को पार्टी के घोषणापत्र में शामिल किया जाए।यह सिर्फ किसी कार्यक्रम में खिंचवाई गई एक तस्वीर नहीं है। यहां राजनीतिक मुद्दे पर सार्वजनिक समर्थन और BJP नेता से सीधे राजनीतिक अपील दर्ज है।
Exams Fighters के सोशल मीडिया चैनल पर भी कुणाल के पुराने पोस्ट और BJP नेता अमर बाउरी के बयानों को प्रमुखता से साझा किए जाने के उदाहरण मिलते हैं।PM मोदी से मुलाकात भी हुई थीदिलचस्प बात यह भी है कि JSSC-CGL के अभ्यर्थियों के प्रतिनिधिमंडल में कुणाल प्रताप सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल चुके हैं। उस मुलाकात के बाद कुणाल ने कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने JSSC-CGL पेपर लीक, JPSC और अभ्यर्थियों की समस्याओं को रखा।इससे यह तो साबित नहीं होता कि कुणाल BJP के साथ हैं।लेकिन जब किसी व्यक्ति के पुराने पोस्ट में BJP के वरिष्ठ नेताओं के प्रति खुला समर्थन दिखाई दे, प्रधानमंत्री से मुलाकात हो, BJP नेताओं के साथ उसकी राजनीतिक गतिविधियों के कई उदाहरण मिलें और वही व्यक्ति बाद में एक बड़े छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन जाए, तो उसकी राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
और अब BJP नेता अस्पताल पहुंच रहे हैं21 अगस्त को प्रदर्शन के दौरान कुणाल प्रताप सिंह के बेहोश होकर सदर अस्पताल पहुंचने की खबर सामने आई। इसके बाद BJP के हटिया विधायक नवीन जायसवाल और वरुण साहू उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे।यह मुलाकात अपने आप में किसी राजनीतिक गठजोड़ का सबूत नहीं है। घायल व्यक्ति से मिलने कोई भी नेता जा सकता है।लेकिन सवालों की कड़ी यहां भी जुड़ती है—क्या BJP और कुणाल के बीच सिर्फ मुद्दों का रिश्ता है या इसके पीछे कोई राजनीतिक समझ भी है?इसका जवाब कुणाल ही बेहतर दे सकते हैं।छात्र आंदोलन असली है, लेकिन चेहरों पर सवाल क्यों नहीं?यहां एक बात साफ होनी चाहिए—JPSC-JSSC को लेकर छात्रों की समस्याएं वास्तविक हैं।
परीक्षा व्यवस्था, कथित अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को केवल राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।कुणाल प्रताप सिंह इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, यह भी तथ्य है। 21 अगस्त की घटनाओं के बाद उनके और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज होने की खबर भी सामने आई है। हालांकि FIR में नाम होना किसी अपराध का प्रमाण नहीं है।
सवाल आंदोलन की वैधता का नहीं, सवाल उसके नेतृत्व की निष्पक्षता का है।क्योंकि अगर एक नेता कहता है कि आंदोलन राजनीतिक नहीं है, तो जनता यह जानना चाहेगी कि उसकी अपनी राजनीतिक गतिविधियां कितनी निष्पक्ष हैं।अब कुणाल से कुछ सीधे सवालकुणाल प्रताप सिंह से सवाल पूछा जाना चाहिए—23 जुलाई को जंतर-मंतर के NEET प्रदर्शनकारियों के लिए आपने “पिछवाड़ा लाल और हरा” करने की बात क्यों कही?अगर आपको प्रदर्शन में कुछ लोग छात्र नहीं लग रहे थे, तो क्या पूरे आंदोलन को उसी नजर से देखना उचित था?क्या आज भी आप अपने उस पोस्ट पर कायम हैं?अमर बाउरी और अन्य BJP नेताओं के साथ आपकी राजनीतिक नजदीकी क्या सिर्फ छात्र हित तक सीमित है?क्या BJP से आपका कोई औपचारिक या अनौपचारिक राजनीतिक संबंध है?और सबसे बड़ा सवाल—जब आप कहते हैं कि छात्र आंदोलन किसी राजनीतिक दल का मंच नहीं होना चाहिए, तो क्या यही नियम आपके अपने राजनीतिक संपर्कों पर भी लागू होता है?क्योंकि तस्वीरें अकेले किसी की राजनीति तय नहीं करतीं।पोस्ट, बयान, राजनीतिक संपर्क और समय के साथ सामने आती भूमिका—इन सबको साथ रखकर ही किसी नेता की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।आज झारखंड का छात्र अपने भविष्य के लिए सड़क पर है।
उसे यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके आंदोलन की कमान संभालने वाला व्यक्ति सिर्फ छात्रों के हित में खड़ा है या उसके पीछे कोई राजनीतिक समीकरण भी काम कर रहा है।फिलहाल आरोप साबित नहीं हुआ है, लेकिन सवाल जरूर खड़ा हो गया है। और इस सवाल का जवाब कुणाल प्रताप सिंह को देना चाहिए। क्या छात्रों के साथ कुणाल राजनीत कर गए है ?
