मुफ्ती अब्दुल्लाह अजहर कासमीस्वतंत्रता आंदोलन में उलेमा और मुसलमानों का रहा है बे-मिसाल योगदानरांची। ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-उलेमा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुफ्ती अब्दुल्लाह अजहर कासमी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि देश की आजादी के लिए भारतीय उलेमा और मुसलमानों की कुर्बानियों का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है।
उन्होंने अपील की कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सभी लोग अपने-अपने संस्थानों और घरों में झंडोत्तोलन का आयोजन जरूर करें तथा नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों से अवगत कराएं।उन्होंने कहा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय उलेमा और मुसलमानों की कुर्बानियों ने देशवासियों में आजादी की भावना और जोश पैदा किया। वर्ष 1757 में बंगाल के प्लासी के मैदान में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए सिराजुद्दौला ने देश और अपनी आन-बान की रक्षा के लिए शहादत दी। वहीं, मैसूर के शासक सुल्तान-ए-शहीद टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ चार बड़ी लड़ाइयां लड़ीं और 1799 में अंग्रेजों की साजिश और अपनों की गद्दारी के बीच शहादत पाई। उन्होंने अंग्रेजों की पेशकश ठुकराते हुए कहा था कि “गीदड़ की सौ साल की जिंदगी से शेर की एक दिन की जिंदगी बेहतर है।
”मुफ्ती अब्दुल्लाह अजहर कासमी ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में उलेमा और मुसलमानों के योगदान का विस्तृत इतिहास ऐतिहासिक पुस्तकों में मौजूद है, लेकिन दुर्भाग्य से नई पीढ़ी को उनके बलिदानों से परिचित कराने में हम काफी हद तक नाकाम रहे हैं।उन्होंने कहा कि 1803 में शाह अब्दुल अजीज मुहद्दिस देहलवी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ फतवा जारी किया था। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत में नौकरी करने और उसका सहयोग करने को गलत बताया तथा देश और समाज की रक्षा के लिए संघर्ष का आह्वान किया।
उस दौर में अंग्रेजों ने भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इस संघर्ष के बाद बड़ी संख्या में उलेमा और मुसलमानों ने अपनी जान की कुर्बानी दी।उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में मौलाना अबुल कलाम आजाद का योगदान भी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने अल-हिलाल और अल-बलाग जैसे अखबारों के माध्यम से देशवासियों, विशेषकर युवाओं में आजादी की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेज सरकार ने उन्हें नजरबंद कर बंगाल से रांची भेज दिया, जहां उन्होंने कई वर्षों तक नजरबंदी का सामना किया। बाद में वे महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और देश की आजादी तक संघर्ष करते रहे।उन्होंने कहा कि आजाद भारत में भी जब-जब देश की सीमाओं पर खून की जरूरत पड़ी, मुसलमानों ने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
शहीद ब्रिगेडियर उस्मान और शहीद अब्दुल हमीद सहित हजारों वीरों की शहादत इसका प्रमाण है।मुफ्ती अब्दुल्लाह अजहर कासमी ने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने देशवासियों को हमेशा हिंदू-मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित और आदिवासी एकता का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता और आपसी भाईचारे में है। हमें नफरत की जगह मोहब्बत को बढ़ावा देना चाहिए और संविधान में विश्वास रखते हुए देश को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।उन्होंने देशवासियों से अपील की कि स्वतंत्रता दिवस को केवल एक त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि देश के स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों को याद करने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के अवसर के रूप में मनाएं।उन्होंने कहा कि हमें मिलकर ऐसा भारत बनाना है, जहां सभी धर्मों और समुदायों के लोग भाईचारे के साथ रहें और देश की एकता, अखंडता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करें।उन्होंने संदेश दिया—“सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा।”
