दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोज जनता पार्टी (CJP) और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर NEET पेपर लीक के खिलाफ धरना-प्रदर्शन और आंदोलन किया गया। छात्रों की मुख्य मांग थी कि NEET पेपर लीक के कारण जिन लोगों की मौत हुई है और जिन बच्चों ने आत्महत्या की है, उनके परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए। साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, पेपर लीक में शामिल सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो और भविष्य में NEET का पेपर दोबारा लीक न हो, इसकी पूरी सुरक्षा की गारंटी दी जाए।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जिस तरह पुलिस ने आंदोलन को कुचलने के लिए बर्बरता दिखाई, गोली चलाई, बच्चों और बच्चियों के साथ कथित तौर पर गलत व्यवहार किया और छात्रों की जमकर पिटाई की, वह बेहद गंभीर घटना थी। पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया और गोली चलाकर कई लोगों को घायल किया। बड़ी संख्या में छात्र लहूलुहान हुए। बिहार में भी छात्रों ने आंदोलन किया तो बिहार पुलिस द्वारा छात्रों के साथ बर्बरता किए जाने के आरोप लगे। सिवान में AK-47 से गोली चलाए जाने की बात भी सामने आई, जिसमें कई छात्रों के घायल होने का दावा किया गया। यह बहुत बड़ी घटना थी।केंद्र सरकार के छात्रों के प्रति इस रवैये के बाद पूरे देश के नौजवानों और छात्रों में गुस्से की लहर दौड़ गई।
लोग नाराज हुए और विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। संसद में सरकार से जवाब मांगा गया, लेकिन सरकार के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था। इसके बाद सरकार दबाव में आई और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तथा कुछ अन्य घोषणाओं की बात सामने आई। छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ। FIR होते रहे और गिरफ्तारियां भी जारी रहीं।आंदोलन आश्वासन के बाद भले ही समाप्त हुआ, लेकिन विपक्ष ने छात्रों पर अत्याचार और गोली चलाए जाने के आरोपों को लेकर केंद्र सरकार को संसद के दोनों सदनों में घेरना शुरू कर दिया।
सरकार के पास इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं था। गृहमंत्री अमित शाह के संसद में उपस्थित नहीं होने और सवालों का जवाब नहीं देने को लेकर भी विपक्ष ने लगातार सवाल उठाए। प्रधानमंत्री से भी जवाब मांगा गया। कुल मिलाकर केंद्र सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही थी और विपक्ष संसद में लगातार इन मुद्दों को उठा रहा था। अमित शाह के खिलाफ भी बड़ा मोर्चा खोलकर उनके इस्तीफे की मांग की जा रही थी। यानी छात्रों के प्रति केंद्र सरकार के रवैये के बाद सरकार डिफेंसिव मोड में आ चुकी थी और उसके सामने संसद में जवाब देने की बड़ी चुनौती थी।
इसके बाद झारखंड में JPSC और JSSC की चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ। शुरुआत में यह आंदोलन पूरी तरह छात्रों का आंदोलन था। छात्र शांतिपूर्ण तरीके से जयपाल सिंह स्टेडियम में आंदोलन कर रहे थे।लेकिन धीरे-धीरे भाजपा से जुड़े लोग और भाजपा से जुड़े छात्र संगठनों के लोग आंदोलन में शामिल होते गए। आरोप है कि उन्होंने आंदोलन को एक राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश शुरू कर दी और आंदोलन को भाजपा की विचारधारा के आधार पर आगे बढ़ाया जाने लगा। धीरे-धीरे आंदोलन का स्वरूप राजनीतिक और धार्मिक रंग लेने लगा। हिन्दू मुस्लिम की बात खुल कर कही जाने लगी।
छात्र आंदोलन धीरे धीरे हिन्दू वादी नेताओं का जमावड़ा बनता गया। जो गोदी मीडिया दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन को कवर करने की हिम्मत नहीं कर रही थी, वह विपक्ष को घेरने के उद्देश्य से रांची पहुंच गई और भाजपा के नैरेटिव को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों की मांग को जायज़ समझते हुए छात्र संगठनों से बात की। जब 10 अगस्त को छात्रों ने विधानसभा घेराव की बात कही। इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्र संगठनों से बातचीत की और उनकी 14 में से 12 मांगों को मान लिया।
उन्होंने कहा कि सरकार जल्द ही सभी बिंदुओं पर कार्रवाई शुरू करेगी।झारखंड सरकार ने CID जांच भी शुरू की। जांच के तहत JPSC से जुड़े मामले में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी। संबंधित लोगों से पूछताछ की गई और गिरफ्तारियां भी हुईं।छात्रों की कई मांगों पर सरकार सहमत हो चुकी थी। JPSC के अध्यक्ष को इस्तीफा देना पड़ा और JPSC के सदस्यों को भी इस्तीफा देना पड़ा। यानी जिस आंदोलन की शुरुआत छात्रों की मांगों से हुई थी, उसमें सरकार ने बातचीत का रास्ता अपनाया और कई मांगों पर कार्रवाई भी शुरू कर दी। अब सवाल उठता है जब सरकार ने 95% छात्रों की बात मान ली थी, फिर 10 अगस्त को विधानसभा घेराव क्यों? अचानक 10 अगस्त को झारखंड के छात्र संगठनों ने विधानसभा घेराव का कार्यक्रम कयों रखा? प्रशासन को आश्वासन दिया गया था कि घेराव शांतिपूर्ण तरीके से होगा और किसी तरह की तोड़फोड़ नहीं होगी।
प्रशासन की ओर से भी बल प्रयोग नहीं करने की बात कही गई थी। सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए विधानसभा के आसपास 10 से 12 बैरिकेड लगाए और पुलिस की व्यवस्था कड़ी की।जब छात्र आंदोलन विधानसभा के आसपास पहुंचा तो छात्रों में शामिल कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा हिंसा किए जाने की बात सामने आई। यह भी आरोप लगाया गया कि इनमें कुछ लोग भाजपा से जुड़े हुए थे।यह भी बताया जाता है कि भाजपा ने आंदोलन को उग्र और भड़काऊ बनाने के लिए बिहार, बंगाल और ओडिशा से युवाओं को बुलाया था।
गाड़ियों में भरकर युवाओं को लाए जाने के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए।आरोप है कि भाजपा से जुड़े लोगों ने हाथों में पत्थर लेकर छात्रों के नाम पर उपद्रव किया। उन्होंने पुलिस पर हमला किया और विधानसभा के बैरिकेड तोड़ दिए। इसके बावजूद पुलिस ने शुरुआत में लाठीचार्ज नहीं किया। जब बैरिकेड पूरी तरह तोड़ दिए गए और लोग विधानसभा परिसर में घुसने की कोशिश करने लगे, तब भी पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया।लेकिन जब पुलिसकर्मियों पर जूते-चप्पल और पत्थरों से हमला किया गया और कई पुलिसकर्मी घायल हो गए, तब पुलिस ने अपनी जान बचाने के लिए हल्का-फुल्का बल प्रयोग किया और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसके बाद प्रशासन ने घायल छात्रों को तुरंत अस्पताल भेजा।लेकिन शाम होते-होते भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया।
बीजेपी ने अगले दिन झारखण्ड बंद का कॉल कर दिया। बीजेपी अब इस आंदोलन को पूरी तरह राजनीतीक बनाने में पड़ गई थी। जो भाजपा कुछ समय पहले संसद में छात्रों पर गोली चलाए जाने और कथित पुलिस ज्यादती के सवालों का जवाब देने से बच रही थी, उसे झारखंड में हुए हल्के बल प्रयोग के रूप में एक नया मुद्दा मिल गया।झारखंड की घटना को लेकर भाजपा ने केंद्र से लेकर राज्य तक इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। लोकसभा परिसर में भाजपा के नेता बैनर और पोस्टर लेकर राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ खड़े हो गए और सवाल करने लगे कि राहुल गांधी जवाब दें कि छात्रों पर लाठी क्यों चली।
भाजपा ने छत्रों के कंधे से राजनीती शुरू कर दी बीजेपी एक तरह से नई राजनीतिक ऊर्जा मिल गई। जो पार्टी कुछ समय पहले छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के सवालों पर घिरी हुई थी, वही अब झारखंड की घटना को लेकर कांग्रेस को घेरने लगी।लेकिन यहां भाजपा का राजनीतिक खेल उल्टा पड़ गया।कांग्रेस के विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने साफ कहा कि वह झारखंड के छात्रों के साथ हैं और छात्रों के आंदोलन के साथ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक छात्रों की मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक उनका समर्थन जारी रहेगा। राहुल गांधी का यह रुख भाजपा के लिए परेशानी का कारण बन गया।भाजपा को लगा कि कहीं झारखंड का आंदोलन समाप्त न हो जाए। इसके बाद आरोप है कि भाजपा ने अपने युवा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आंदोलन में शामिल होने के लिए आगे किया और आंदोलन को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश शुरू कर दी।आज स्थिति यह बताई जा रही है कि आंदोलन पर भाजपा समर्थित लोगों का प्रभाव बढ़ गया है और असली छात्र आंदोलन से दूर होते जा रहे हैं। आदिवासी छात्र संगठन और दूसरे छात्र संगठन और सामाजिक संगठनों के कई लोग भी आंदोलन से अलग हो चुके हैं।
आंदोलन में अब कुछ गिने-चुने छात्र ही दिखाई दे रहे हैं। जो छात्र शुरू से आंदोलन कर रहे थे, उनमें से भी कई लोगों का कहना है कि 10 अगस्त के बाद पुराने आंदोलनकारी धीरे-धीरे पीछे हटते चले गए।अब असली सवाल क्या है? सवाल यह नहीं है कि छात्र आंदोलन कर रहे हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? छात्रों की मांगें जायज हैं। नियुक्ति प्रक्रिया में अगर गड़बड़ी हुई है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और योग्य छात्रों को न्याय मिलना चाहिए।मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार ने बातचीत का रास्ता अपनाया, छात्रों की कई मांगों को माना और जांच की प्रक्रिया शुरू की।
अब सरकार की जिम्मेदारी है कि जांच को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाए और छात्रों को उसका परिणाम दिखाए।कांग्रेस और राहुल गांधी की भी भूमिका यही होनी चाहिए कि वे छात्रों की जायज मांगों का समर्थन करें और उनकी आवाज को लोकतांत्रिक तरीके से उठाएं। लेकिन भाजपा को यह जवाब देना होगा कि जिस समय देश के छात्र NEET और पुलिस कार्रवाई जैसे गंभीर सवालों को लेकर आंदोलन कर रहे थे, उस समय छात्रों के मुद्दे पर उसकी भूमिका क्या थी?और आज झारखंड के छात्रों के आंदोलन में इतनी राजनीतिक सक्रियता क्यों दिखाई दे रही है? छात्रों का आंदोलन छात्रों का ही रहना चाहिए। उसे किसी भी राजनीतिक दल का राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए।क्योंकि आखिरकार यह लड़ाई भाजपा, कांग्रेस या किसी दूसरे राजनीतिक दल की नहीं है। यह लड़ाई झारखंड के लाखों छात्रों के भविष्य की है।भवदीय तनवीर अहमद सामाजिक कार्यकर्त्ता 9431101871
